चीन का तेल आयात 8 साल के निचले स्तर पर पहुंचा

चीन का तेल आयात 8 साल के निचले स्तर पर पहुंचा
दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में शामिल China ने मई महीने में तेल आयात के मामले में पिछले आठ वर्षों का सबसे कमजोर प्रदर्शन दर्ज किया है। चीनी सीमा शुल्क विभाग के आंकड़ों के अनुसार, मई में देश का कुल कच्चा तेल आयात लगभग 3.3 करोड़ बैरल रहा, जो प्रतिदिन करीब 78 लाख बैरल के बराबर है। यह स्तर अक्टूबर 2017 के बाद सबसे कम माना जा रहा है और पिछले वर्ष के औसत 1.16 करोड़ बैरल प्रतिदिन आयात की तुलना में काफी नीचे है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस गिरावट के पीछे प्रमुख कारण पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और फारस की खाड़ी क्षेत्र में तेल टैंकर यातायात में व्यवधान के कारण कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी है। तेल की बढ़ी हुई कीमतों ने चीनी रिफाइनरियों पर दबाव बढ़ाया है, जिसके चलते उन्होंने विदेशों से खरीदारी कम कर दी है।
हालांकि, यह स्थिति चीन में तेल की मांग में कमजोरी का संकेत नहीं देती। बाजार विश्लेषकों का कहना है कि चीन के पास पहले से ही विशाल रणनीतिक और वाणिज्यिक तेल भंडार मौजूद हैं, जिनका अनुमान 1 अरब बैरल से अधिक लगाया जाता है। यही कारण है कि देश फिलहाल अपने भंडार का उपयोग करके आयात में कटौती करने में सक्षम है। इस बड़े स्टॉक ने चीन को अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊंची कीमतों के दौरान खरीदारी कम करने की सुविधा दी है।
चीन की रिफाइनरियों की गतिविधियों में भी कमी देखी गई है। रिफाइनरी रन रेट्स घटे हैं और ईंधन निर्यात में भी कमी आई है। बीजिंग प्रशासन घरेलू बाजार में डीजल और पेट्रोल की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने को प्राथमिकता दे रहा है ताकि ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित न हो। इससे यह स्पष्ट होता है कि सरकार वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच घरेलू ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रही है।
वैश्विक तेल बाजार के लिए यह खबर महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि चीन की आयात मांग में कमी अक्सर अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर दबाव बनाती है। कई ट्रेडर्स और निवेशकों का मानना है कि चीन की कमजोर खरीदारी फिलहाल तेल कीमतों को अधिक तेजी से बढ़ने से रोक रही है। यही कारण है कि हाल के सप्ताहों में तेल बाजार में अपेक्षित तेजी देखने को नहीं मिली, जबकि भू-राजनीतिक जोखिम काफी ऊंचे बने हुए हैं।
फ्रांसीसी बैंकिंग समूह के कमोडिटी विश्लेषकों के अनुसार, चीन की कम खरीदारी ने वैश्विक तेल बाजार को बड़ा सहारा दिया है। उनका कहना है कि यदि चीन सामान्य स्तर पर तेल खरीदता रहता, तो मौजूदा भू-राजनीतिक संकट के दौरान तेल की कीमतें कहीं अधिक ऊंची हो सकती थीं। चीन की यह रणनीति सऊदी अरब द्वारा तेल प्रवाह को पुनर्निर्देशित करने और विभिन्न देशों द्वारा रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार जारी करने जैसे कदमों के बराबर प्रभाव डाल रही है।
हालांकि, विशेषज्ञ यह भी चेतावनी दे रहे हैं कि यह स्थिति स्थायी नहीं है। चीन के विशाल तेल भंडार लगातार उपयोग में आ रहे हैं और समय के साथ इन्हें फिर से भरना आवश्यक होगा। यदि उस समय तक वैश्विक तनाव या युद्ध जैसी परिस्थितियां बनी रहती हैं, तो चीन को मजबूरी में बड़े पैमाने पर तेल आयात बढ़ाना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में एक और बड़ी तेजी देखने को मिल सकती है।
विश्लेषकों का अनुमान है कि जुलाई से सितंबर के बीच गर्मियों के मौसम में ऊर्जा मांग पारंपरिक रूप से बढ़ती है। इसी अवधि में वैश्विक तेल मांग में प्रतिदिन 30 लाख बैरल से अधिक की अतिरिक्त वृद्धि हो सकती है। यदि चीन इसी दौरान अपने भंडार को दोबारा भरने के लिए आयात बढ़ाता है, तो तेल बाजार में आपूर्ति और मांग का संतुलन तेजी से बदल सकता है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान में चीन का कम तेल आयात वैश्विक बाजार को राहत दे रहा है, लेकिन यह राहत अस्थायी हो सकती है। आने वाले महीनों में चीन की खरीदारी रणनीति, मध्य पूर्व की भू-राजनीतिक स्थिति और वैश्विक आर्थिक गतिविधियां तेल की कीमतों की दिशा तय करेंगी। इसलिए निवेशकों, ऊर्जा कंपनियों और नीति निर्माताओं की नजर अब चीन के अगले कदमों पर टिकी हुई है।
यदि चीन अपने भंडार को पुनः भरने के लिए आयात बढ़ाता है और साथ ही वैश्विक आपूर्ति बाधित रहती है, तो कच्चे तेल की कीमतें एक बार फिर तेज उछाल दर्ज कर सकती हैं। ऐसे में दुनिया भर के ऊर्जा बाजारों और आयातक देशों पर इसका सीधा असर देखने को मिल सकता है।
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