हिंदी भाषा का किसी के साथ मुकाबला नहीं- अमित शाह

अमित शाह का हिंदी भाषा पर बड़ा बयान, कहा हिंदी का किसी से मुकाबला नहीं है और 2029 से पहले 21 राज्यों में UCC लागू होगा।
गृह मंत्री अमित शाह अक्सर अपने बयानों को लेकर सुर्खियां बटोरते हैं. इसी बीच एक बार उन्होंने ऐसा बयान दिया जो इस समय सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. उन्होंने अपने एक बयान में कहा कि हिंदी का दूसरी भारतीय भाषाओं से कोई मुकाबला नहीं है। दरअसल, अमित शाह ने अपना ये बयान हिंदी दिवस के मौके पर जनता को वर्चुअली संबोधन के दौरान दिया. आगे अमित शाह ने कहा कि भारत की भाषाई विविधता कमजोरी नहीं, बल्कि देश की सबसे बड़ी ताकत में से एक है और भाजपा के नेतृत्व वाली NDA सरकारें 2029 से पहले 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करेंगी।
अमित शाह के भाषण की बड़ी बातें
राष्ट्र निर्माण और जन-कल्याण का साधन: अमित शाह ने आगे कहा कि स्वतंत्रता मिलने के बाद देश की सभी स्थानीय व क्षेत्रीय भाषाओं ने प्रशासन, विकास कार्यों और राष्ट्र निर्माण की विकास योजनाओं को आम जनता तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन भाषाओं ने जनजागरण और राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया है।
आम जनता से संवाद का सशक्त माध्यम: हालांकि गृह मंत्री की अपनी मातृभाषा गुजराती है, लेकिन उनका मानना है कि देश के किसी भी हिस्से में जाने पर आम नागरिकों के साथ सीधे भावनात्मक और व्यावहारिक रूप से जुड़ने का सबसे बड़ा माध्यम हिंदी ही बनती है।
अगैर-हिंदी भाषी महानुभावों का योगदान: देश की एकता में हिंदी के महत्व को समझते हुए कई गैर-हिंदी भाषी महापुरुषों ने भी इसे अपनाया। गुजराती भाषी स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपना प्रसिद्ध ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ हिंदी में लिखा, गुजराती मूल के महात्मा गांधी ने दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए सभा की स्थापना की, और बंगाली भाषी नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज में संवाद के लिए हिंदी को चुनकर देश को ‘जय हिंद’ का नारा दिया।
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औपनिवेशिक मानसिकता से स्वतंत्रता: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन का जिक्र करते हुए यह कहा गया है कि देश को गुलामी की औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त कराना है, और इस वैचारिक स्वतंत्रता को हासिल करने में भाषा सबसे बड़ा हथियार साबित होती है।
राष्ट्रीय स्वाभिमान और कानूनों में बदलाव: ‘राजपथ’ का नाम बदलकर ‘कर्तव्य पथ’ करना और अंग्रेजों के समय के पुराने आपराधिक कानूनों को समाप्त कर उनकी जगह भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता तथा भारतीय साक्ष्य अधिनियम लागू करना केवल कानूनी या नाममात्र का बदलाव नहीं है, बल्कि यह देश के राष्ट्रीय स्वाभिमान और गौरव की पुनर्स्थापना का प्रतीक है।
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