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9% छात्रों को आता है आत्महत्या का विचार, NTF सर्वे में चौंकाने वाले आंकड़े

उच्च शिक्षण संस्थानों में 9% छात्रों को आत्महत्या का विचार, NTF Mental Health Survey में चौंकाने वाले आंकड़े

उच्च शिक्षण संस्थानों में 9% छात्रों को आत्महत्या का विचार, NTF Mental Health Survey में चौंकाने वाले आंकड़े

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Vivekनई दिल्ली, 30 सितंबर 2026, (अपडेटेड 07:46 am)

देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों की मानसिक सेहत को लेकर एक गंभीर तस्वीर सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित नेशनल टास्क फोर्स (NTF) के देशव्यापी सर्वे में पता चला है कि करीब 9 प्रतिशत छात्रों को अक्सर आत्महत्या का विचार आता है। वहीं, लगभग 34 प्रतिशत छात्रों ने माना कि वे अपने ही कैंपस में खुद को बाहरी या अलग-थलग महसूस करते हैं।

यह सर्वे देशभर के उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों की मानसिक स्थिति, कैंपस के माहौल और प्रशासन के प्रति उनके भरोसे को समझने के उद्देश्य से किया गया है। इसमें 2.43 लाख से अधिक छात्रों के जवाब शामिल किए गए हैं। सर्वे में भाग लेने वाले करीब 67 प्रतिशत छात्र SC, ST और OBC वर्गों से थे।

15% छात्रों ने बताया- कई हफ्तों तक रहा तनाव और एंग्जाइटी

सर्वे में छात्रों से पिछले छह महीनों के दौरान उनकी मानसिक स्थिति के बारे में भी सवाल किए गए। करीब 15 प्रतिशत छात्रों ने बताया कि इस अवधि में वे कभी न कभी बहुत ज्यादा तनाव या कई सप्ताह तक एंग्जाइटी से परेशान रहे। विशेषज्ञों के मुताबिक, लंबे समय तक रहने वाला तनाव और चिंता छात्र की पढ़ाई, सामाजिक जीवन और रोजमर्रा के व्यवहार को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में समय रहते छात्रों की समस्याओं को पहचानना और उन्हें उचित मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण हो जाता है।

हालांकि, सर्वे में एक सकारात्मक पहलू भी सामने आया है। करीब 56 प्रतिशत छात्रों ने कहा कि गंभीर समस्याओं को निष्पक्ष तरीके से सुलझाने के लिए उन्हें अपने संस्थान के प्रशासन पर भरोसा है। इससे पता चलता है कि बड़ी संख्या में विद्यार्थी अपनी समस्याओं के समाधान के लिए संस्थागत व्यवस्था पर विश्वास करते हैं।

मार्च 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने गठित की थी NTF

उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों की आत्महत्या के बढ़ते मामलों और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2025 में नेशनल टास्क फोर्स का गठन किया था। इस टास्क फोर्स का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों की मानसिक सेहत, आत्महत्या के कारणों और कैंपस में उनके सामने आने वाली चुनौतियों का अध्ययन करना है। टास्क फोर्स की अध्यक्षता जस्टिस एस. रवींद्र भट कर रहे हैं।

NTF की विस्तृत रिपोर्ट 31 अक्टूबर तक सुप्रीम कोर्ट में पेश किए जाने की उम्मीद है। इस रिपोर्ट में छात्रों की मानसिक सेहत सुधारने और आत्महत्या के मामलों को रोकने के लिए कई उपाय सुझाए जाने की संभावना है।

छात्रों में Suicide Risk के शुरुआती संकेत पहचानना जरूरी

मनोवैज्ञानिक डॉ. जेपी अग्रवाल के अनुसार, छात्रों में आत्महत्या की प्रवृत्ति को रोकने के लिए सबसे पहले इसके शुरुआती संकेतों की पहचान करना जरूरी है। उनका मानना है कि कई बार छात्र अपनी परेशानियों के बारे में सीधे बात नहीं करते। ऐसे में उनके आसपास मौजूद शिक्षक, काउंसलर, हॉस्टल वार्डन और सहपाठी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसके लिए कॉलेज और यूनिवर्सिटी स्तर पर गेटकीपर ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाए जाने की जरूरत है। इसके तहत शिक्षकों, काउंसलरों और हॉस्टल वार्डन को छात्रों के व्यवहार में होने वाले बदलावों और मानसिक तनाव के संकेत पहचानने की ट्रेनिंग दी जा सकती है।

छात्रों को भी इस तरह की ट्रेनिंग में शामिल किया जा सकता है। उन्हें तनाव, डिप्रेशन और आत्महत्या के जोखिम से जुड़े शुरुआती संकेतों को समझने के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर अपने दोस्तों या सहपाठियों को सहायता लेने के लिए प्रोत्साहित करने की जानकारी दी जा सकती है।

Tele-MANAS और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की जानकारी जरूरी

विशेषज्ञों ने छात्रों के बीच मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सरकारी सेवाओं के बारे में जागरूकता बढ़ाने पर भी जोर दिया है। छात्रों को Tele-MANAS हेल्पलाइन और Manhit ऐप जैसी सेवाओं की जानकारी उपलब्ध कराने की जरूरत बताई गई है।

मानसिक स्वास्थ्य सहायता तक आसान पहुंच छात्रों को अपनी परेशानी के शुरुआती चरण में ही मदद लेने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है। इसके अलावा कॉलेज और यूनिवर्सिटी में काउंसलिंग सेंटरों को अधिक प्रभावी और आसानी से उपलब्ध बनाने की जरूरत भी बताई जाती रही है।

Suicide के पीछे कई कारण हो सकते हैं

विशेषज्ञों के अनुसार, किसी छात्र की आत्महत्या के पीछे सिर्फ एक कारण जिम्मेदार हो, ऐसा जरूरी नहीं है। अलग-अलग मामलों में शैक्षणिक दबाव, पारिवारिक परिस्थितियां, आर्थिक परेशानी, व्यक्तिगत संबंध, अकेलापन, सामाजिक अलगाव और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं अलग-अलग भूमिका निभा सकती हैं।
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इसीलिए छात्रों की आत्महत्या के मामलों को समझने के लिए Psychological Autopsy की व्यवस्था को अनिवार्य किए जाने की मांग भी सामने आई है। इसमें मृत्यु से पहले व्यक्ति की मानसिक स्थिति, व्यवहार में आए बदलाव और संभावित जोखिम कारकों का अध्ययन किया जाता है। ऐसे अध्ययन भविष्य में आत्महत्या के जोखिम को पहचानने और रोकथाम के लिए बेहतर नीतियां तैयार करने में मदद कर सकते हैं।

11 साल में Higher Education में दाखिले बढ़े

देश में पिछले एक दशक से अधिक समय में उच्च शिक्षा में दाखिला लेने वाले छात्रों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। आंकड़ों के अनुसार, 2011 से 2022 के बीच उच्च शिक्षा में छात्रों की संख्या 2.92 करोड़ से बढ़कर 4.33 करोड़ हो गई। इसी अवधि में उच्च शिक्षा से जुड़े छात्रों में आत्महत्या की दर भी बढ़ी। प्रति एक लाख छात्रों पर आत्महत्या की दर 26.37 से बढ़कर 30.02 हो गई। इन आंकड़ों के बीच विशेषज्ञों के लिए यह सवाल महत्वपूर्ण है कि उच्च शिक्षा के विस्तार के साथ छात्रों को मिलने वाली मानसिक स्वास्थ्य सहायता और संस्थागत सहयोग को किस तरह मजबूत किया जाए।

IIT Bombay में छात्र की मौत के बाद कैंपस में प्रदर्शन

छात्र आत्महत्या का मुद्दा सितंबर 2026 में IIT बॉम्बे के एक मामले के बाद भी चर्चा में रहा। 18 सितंबर 2026 की शाम IIT बॉम्बे के हॉस्टल में सेकेंड ईयर के छात्र साहिल वाकोडे की मौत हो गई। वह महाराष्ट्र के यवतमाल का रहने वाला था और एनर्जी साइंस एंड इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था। रिपोर्ट के अनुसार, साहिल को परीक्षा हॉल में मोबाइल फोन इस्तेमाल करते हुए पकड़ा गया था। उस पर क्वेश्चन पेपर की तस्वीर चैटजीपीटी पर अपलोड कर नकल करने की कोशिश करने का आरोप था।

Mental Health Survey
Mental Health Survey
छात्र की मौत के बाद कैंपस में करीब 400 छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया। इस घटना ने एक बार फिर उच्च शिक्षण संस्थानों में अनुशासन, परीक्षा व्यवस्था और छात्रों पर पड़ने वाले मानसिक दबाव को लेकर चर्चा को तेज किया।

Mental Health को Higher Education का अहम हिस्सा बनाने की जरूरत

NTF के सर्वे से सामने आए आंकड़े बताते हैं कि उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों की मानसिक सेहत को लेकर व्यापक स्तर पर काम करने की आवश्यकता है। सिर्फ अकादमिक प्रदर्शन और करियर पर ध्यान देने के बजाय छात्रों के भावनात्मक और सामाजिक स्वास्थ्य को भी संस्थागत व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जाना जरूरी है।

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समय रहते तनाव और एंग्जाइटी के संकेतों की पहचान, प्रशिक्षित काउंसलरों की उपलब्धता, छात्रों और शिक्षकों के लिए जागरूकता कार्यक्रम, भरोसेमंद शिकायत व्यवस्था और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक आसान पहुंच इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट में पेश होने वाली नेशनल टास्क फोर्स की रिपोर्ट से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों की मानसिक सेहत और सुरक्षा को मजबूत करने के लिए आगे किस तरह की नीतिगत व्यवस्था तैयार की जा सकती है।

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