माँ-बहन रिव्यू: माधुरी और तृप्ति की फिल्म, कमजोर लेखन।

माँ-बहन रिव्यू: माधुरी और तृप्ति की फिल्म, कमजोर लेखन।
माँ-बहन’ एक ऐसे दिलचस्प कॉन्सेप्ट के साथ आती है, जो अपने बोल्ड टाइटल के जरिए उस सामाजिक सोच और भाषा को नए नजरिए से देखने की कोशिश करती है, जिसे अक्सर केवल एक गाली माना जाता है। फिल्म का विचार नारीवाद, व्यंग्य और सामाजिक टिप्पणी को जोड़कर एक अनोखी कॉमेडी-ड्रामा बनाने का था, जो शुरुआती स्तर पर काफी प्रभावशाली लगता है। लेकिन, एक मजबूत विचार होने के बावजूद, फिल्म इसे पर्दे पर सही ढंग से उतारने में विफल रही है।
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी बिखरी हुई पटकथा है। कहानी कई जगहों पर दिशाहीन महसूस होती है और नैरेटिव में निरंतरता (continuity) का अभाव है। कई दृश्य अच्छे विचार के साथ शुरू होते हैं, लेकिन उनका कमजोर निष्पादन और जल्दबाजी उन्हें नीरस बना देती है। यही कारण है कि दर्शक फिल्म के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ नहीं पाते।
फिल्म में माधुरी दीक्षित और तृप्ति डिमरी जैसी बेहतरीन अभिनेत्रियाँ हैं, जिनसे दर्शकों को बहुत उम्मीदें थीं। दोनों कलाकारों ने अपनी अभिनय क्षमता से अपने किरदारों में जान फूंकने की कोशिश की है, लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट ने उन्हें वह गहराई और भावनात्मक स्पेस नहीं दिया, जिसकी इस कहानी को जरूरत थी। एक मजबूत लेखन इन किरदारों को और अधिक प्रभावशाली बना सकता था।
निर्देशन के स्तर पर भी फिल्म असंतुलित है। कॉमेडी और गंभीर सामाजिक संदेश के बीच तालमेल न बैठ पाने के कारण फिल्म कभी हल्की-फुल्की कॉमेडी लगती है, तो कभी अचानक गंभीर उपदेशों की ओर मुड़ जाती है। इसके अलावा, फिल्म का स्क्रीनप्ले कहीं-कहीं बेहद धीमा और खिंचा हुआ लगता है। संगीत और बैकग्राउंड स्कोर भी कहानी के उतार-चढ़ाव को मजबूती देने में नाकाम रहे हैं।
कुल मिलाकर, ‘Maa Behen’ एक बेहतरीन और अनोखे विचार के साथ शुरू होती है, जिसमें काफी संभावनाएं थीं। लेकिन, कमजोर लेखन, दिशाहीन निर्देशन और अधूरे निष्पादन के कारण यह फिल्म अपने उद्देश्य तक नहीं पहुँच पाती। शानदार कलाकारों के बावजूद, यह एक यादगार अनुभव बनने से चूक जाती है और अंततः केवल अधूरी संभावनाओं का एक संग्रह बनकर रह जाती है।
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