देशभर में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले हजारों छात्र आज भी डिग्री प्रमाणपत्र मिलने में हो रही देरी की समस्या का सामना कर रहे हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के स्पष्ट नियम के अनुसार किसी भी छात्र को अंतिम परीक्षा परिणाम घोषित होने के 180 दिनों के भीतर उसकी मूल डिग्री प्रदान कर दी जानी चाहिए। इसके बावजूद कई विश्वविद्यालय इस नियम का पालन नहीं कर रहे हैं, जिससे छात्रों को उच्च शिक्षा, नौकरी और विदेश में पढ़ाई के दौरान गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
झारखंड के चाईबासा स्थित कोल्हान विश्वविद्यालय के छात्र यूसुफ सरफराज इसका एक प्रमुख उदाहरण हैं। उन्होंने सितंबर 2021 में अपनी अंतिम परीक्षा पूरी की, लेकिन उन्हें अपनी मूल डिग्री वर्ष 2025 में जाकर प्राप्त हुई। इस दौरान उन्होंने लंदन जाकर फोटो जर्नलिज्म में मास्टर डिग्री भी पूरी कर ली और भारत लौट आए, लेकिन उनके पास अपनी स्नातक शिक्षा का प्रमाण केवल एक अस्थायी अंकपत्र (प्रोविजनल मार्कशीट) ही था।
डिग्री प्रमाणपत्र में देरी का असर केवल दस्तावेज़ मिलने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह छात्रों के पूरे करियर को प्रभावित करता है। सरकारी और निजी नौकरियों में आवेदन, उच्च शिक्षा में प्रवेश, विदेशी विश्वविद्यालयों की प्रक्रिया, छात्रवृत्ति, वीजा और अन्य आधिकारिक कार्यों में मूल डिग्री की आवश्यकता होती है। ऐसे में वर्षों तक डिग्री का इंतजार छात्रों के भविष्य को अनिश्चित बना देता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि विश्वविद्यालयों को अपनी प्रशासनिक प्रक्रियाओं में सुधार करना चाहिए और डिजिटल व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना चाहिए ताकि छात्रों को समय पर प्रमाणपत्र मिल सकें। यूजीसी के नियमों का सख्ती से पालन कराने के लिए नियमित निगरानी और जवाबदेही तय करना भी आवश्यक है।
छात्रों का कहना है कि जब उन्होंने अपनी पढ़ाई समय पर पूरी कर ली और सभी औपचारिकताएं पूरी कर दीं, तो उन्हें अपनी डिग्री के लिए वर्षों तक इंतजार नहीं करना चाहिए। समय पर डिग्री उपलब्ध कराना केवल एक प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि छात्रों के शैक्षणिक और पेशेवर भविष्य की सुरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है।